प्रकृति की देवी माँ शैलपुत्री
सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए नवरात्र के पावन पर्व में पूजी जाने वाली नौ दुर्गाओं में सर्व प्रथम भगवती शैल पुत्री का नाम आता है। पर्व के पहले दिन बैल पर सवार भगवती मां के पूजन-अर्चना का विधान है। मां के दाहिने हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। अपने पूर्वजन्म में ये दक्ष प्रजापति की कन्या के रूप में पैदा हुई थीं। उस समय इनका नाम सती रखा गया। इनका विवाह शंकर जी से हुआ था। शैलपुत्री देवी समस्त शक्ति यों की स्वामिनी हैं। योगी और साधकजन नवरात्र के पहले दिन अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं और योग साधना का यहीं से प्रारंभ होना कहा गया है।
साधकों के लिए - नवरात्र का प्रथम दिन भगवती शैलपुत्री की आराधना का दिन है। श्रध्दालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं। कुंडलिनी जागरण के साधक इस दिन मूलाधार चक्र को जाग्रत करने की साधना करते हैं। वह गुरु कृपा से प्राप्त ज्ञान विधि का प्रयोग कर कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने की साधना की शुरुआत करते हैं। जगदम्बा भगवती के उपासक श्रध्दा भाव से उनके शैलपुत्री स्वरूप की पूजा कर उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को कृतार्थ करना चाहते हैं।
नवरात्र के प्रथम दिन हम आपको मूलाधार चक्र के बारे में इतना बता देना आवश्यक समझते हैं कि इस चक्र पर बुध ग्रह का आधिपत्य होता है।
साधकों के लिए - नवरात्र का प्रथम दिन भगवती शैलपुत्री की आराधना का दिन है। श्रध्दालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं। कुंडलिनी जागरण के साधक इस दिन मूलाधार चक्र को जाग्रत करने की साधना करते हैं। वह गुरु कृपा से प्राप्त ज्ञान विधि का प्रयोग कर कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने की साधना की शुरुआत करते हैं। जगदम्बा भगवती के उपासक श्रध्दा भाव से उनके शैलपुत्री स्वरूप की पूजा कर उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को कृतार्थ करना चाहते हैं।
नवरात्र के प्रथम दिन हम आपको मूलाधार चक्र के बारे में इतना बता देना आवश्यक समझते हैं कि इस चक्र पर बुध ग्रह का आधिपत्य होता है।
उसका लोक – भूलोक
मातृ देवी – चामुण्डा
देवता – ब्रह्मा
तन्मात्रा – गंध
तत्व - पृथ्वी है
इस चक्र का स्थान - गुदा मूल से दो उंगल ऊपर
अधिष्ठात्री देवी - डाकिनी (जो पृथ्वी को धारण किये हुए है)
इसका प्रभाव क्षेत्र - वाणी, गंध व पैरों की गति है।
निम्लिखित साधना-विधान द्वारा कोई भी साधक अभीष्ट फल प्राप्त कर सकता है।
साधना विधि -
सबसे पहले मां शैलपुत्री की मूर्ति अथवा तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचें लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। इसके ऊपर केशर से 'शं' लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें। तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें। मंत्र इस प्रकार है -
या देवि सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनाकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें। तत्पश्चात् मनोकामना गुटिका का पंचोपचार द्वारा पूजन करें। दीप प्रावलित करके ही पूजन करें। यदि संभव हो तो नौ दिनों तक अखण्ड ज्योति जलाने का विशेष महत्व होत है। इसके बाद नैवेद्य के रूप में उन्हें गाय का घृत अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। संख्या 108 होनी चाहिए। मंत्र - ॐ शं शैलपुत्री देव्यै: नम:। मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां के चरणों में अपनी मनोकामना को व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा श्रद्धा से आरती कीर्तन करें।






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